हमारा इतिहास
हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति की एक गौरवशाली ऐतिहासिक यात्रा की शताब्दी से अधिक की कहानी।
एक भाषा, एक विचार और एक साहित्यिक यात्रा
बीसवीं सदी का आरंभ, भारत के लिये एक नये युग का संकेत लेकर आया था। सदियों से दासता से संतप्त भारत की आत्मा, बेड़ियों से मुक्ति के लिये अपना मन-प्राण लगाने को तत्पर हुई थी।
स्वतंत्रता की देवी का आह्वान करने हेतु उसके पुजारी निखिल भारत में विभिन्न स्थानों पर यज्ञ आरंभ कर चुके थे। किंतु इसमें एक बड़ी बाधा थी— संपूर्ण भारतवर्ष में संचार और संपर्क की एक भाषा का न होना।
जागरूक भारतीयों ने यह अनुभव किया कि देश को एक सूत्र में जोड़ने के लिए हिन्दी को एक संपर्क भाषा के रूप में विकसित करना आवश्यक है।
अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना
सन् 1910 में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई। इस महान कार्य में महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन आदि राष्ट्र-भक्त हिन्दीसेवी महापुरुषों का विशेष योगदान था।
सम्मेलन का उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार, साहित्य के विकास और देश के विभिन्न भागों के लोगों को भाषा के माध्यम से जोड़ना था।
बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की दिशा में कदम
बिहार में प्रांतीय सम्मेलन की परिकल्पना
सन् 1920 में सम्मेलन का 10वाँ अधिवेशन बिहार प्रांत में हुआ। इसी समय बिहार के हिन्दी साहित्य से जुड़े युवा साहित्यसेवियों के मन में प्रांतीय सम्मेलन के गठन का विचार आया।
भगवानपुर (मुजफ्फरपुर) के श्री रामधारी प्रसाद इस विचार को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख व्यक्तियों में थे।
मुजफ्फरपुर में कार्यालय और पुस्तकालय
मई 1921 में श्री बैद्यनाथ प्रसाद सिंह के प्रयत्न और सहयोग से मुजफ्फरपुर में एक छोटा-सा मकान किराए पर लेकर सम्मेलन का कार्यालय स्थापित किया गया।
इसी भवन में सम्मेलन का पुस्तकालय भी आरंभ हुआ और हिन्दी भाषा प्रचारिणी सभा की पुस्तकें एवं फर्निचर सम्मेलन को प्राप्त हुए।
सम्मेलन का पटना की ओर आगमन
सन् 1936 में पूर्णिया में आयोजित सम्मेलन के त्रयोदश अधिवेशन में पंडित छविनाथ पाण्डेय सम्मेलन के प्रधान मंत्री बनाये गये।
पाण्डेय जी के परामर्श पर इसी अधिवेशन में सम्मेलन का कार्यालय पटना में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव पारित किया गया।
तत्कालीन परिस्थितियों में पटना में कार्यालय की व्यवस्था की गयी और आगे चलकर कदमकुआँ में सम्मेलन के अपने भवन के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास शुरू हुए।
1938 से 1951 तक
निर्माण का आरंभ
सम्मेलन के अपने भवन के निर्माण का कार्य आरंभ हुआ।
निर्माण कार्य में बाधा
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पंडित छविनाथ पाण्डेय की गिरफ्तारी के कारण निर्माण कार्य प्रभावित हुआ।
पुनः निर्माण की गति
बाँसी अधिवेशन में श्री रामवृक्ष बेनीपुरी प्रधान मंत्री बने और भवन निर्माण को आगे बढ़ाया। राज्य सरकार से 72,500 रुपये की सहायता प्राप्त हुई।
भवन निर्माण पूर्ण
सन् 1938 में शुरू हुआ भवन निर्माण कार्य सन् 1951 में पूरा हुआ। साहित्यकारों और पदाधिकारियों ने भी सहयोग एवं श्रमदान किया।
साहित्य का एक प्रतिष्ठित केंद्र
सम्मेलन से हिन्दी साहित्य के विश्रुत संपादक और साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय तथा हिन्दी-समालोचना के शलाका-पुरुष आचार्य नलिनविलोचन शर्मा सक्रियता से जुड़ गये थे।
सम्मेलन की शोध-पत्रिका ‘साहित्य’ का प्रकाशन आरंभ हो चुका था, जिसकी ख्याति संपूर्ण भारतवर्ष में फैल चुकी थी।
देश के बड़े-बड़े साहित्यकार इस साहित्यिक केंद्र में आते थे। मुंशी प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकार अपनी रचनाओं को प्रकाशन से पहले आचार्यों से दिखाना आवश्यक समझते थे।
‘साहित्य’ शोध-पत्रिका
शोध एवं साहित्यिक सामग्री के प्रकाशन को प्रोत्साहन।
बच्चन देवी गोष्ठी
साहित्यिक संवाद और विद्वानों की सहभागिता।
कला एवं संगीत
कला और संगीत के प्रशिक्षण की व्यवस्था।
भाषा प्रशिक्षण
हिन्दी और विभिन्न भारतीय भाषाओं की कक्षाएँ।
विदेशी भाषाएँ
जर्मन, फ्रेंच और रूसी आदि भाषाओं का अध्ययन।
प्रतियोगिताएँ एवं परीक्षाएँ
विद्यार्थियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए परीक्षाएँ।
स्वर्णिम आभा का मंद पड़ना
कालांतर में धीरे-धीरे सम्मेलन की स्वर्णिम आभा मंद पड़ने लगी। बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक आते-आते इसकी दिव्यता और प्रभा समाप्तप्राय हो गयी।
साहित्य और मनुष्यता के जिन मूल्यों के लिए इसकी स्थापना हुई थी, वे भी समय के साथ कमजोर पड़ते गये।
नये स्वर्णिम इतिहास की ओर
सच्चे और अच्छे साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने पुनः प्रज्ञा की देवी सरस्वती को जगाने के लिये नयी वेदी बनाकर यज्ञ आरंभ किया है, जिसमें निरंतर समिधा दी जा रही है।
हम नये स्वर्णिम इतिहास की नींव पड़ते देख रहे हैं। आशा है कि वे दिन पुनः लौटेंगे, जब बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन सम्पूर्ण भारतवर्ष में तीर्थ-सा आदर पाता था।