बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन

स्थापना

हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार, संरक्षण और उन्नयन की एक ऐतिहासिक यात्रा।

सम्मेलन की स्थापना

19 १९ अक्टूबर १९१९

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना, देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद (भारत के प्रथम राष्ट्रपति) की सहमति से, १९ अक्टूबर १९१९ को, मुज़फ़्फ़रपुर के हिंदू भवन में, नगर के तत्कालीन नगरपालिका-अध्यक्ष श्री वैद्यनाथ प्रसाद सिंह के सौजन्य से, श्री जगन्नाथ प्रसाद, एम ए बी एल 'काव्यतीर्थ' के सभापतित्व में, सम्मेलन की स्थापना के सूत्रधार श्री रामधारी प्रसाद, आचार्य मथुरा प्रसाद दीक्षित, पीर मुहम्मद मूनिस, श्री राघव प्रसाद सिंह, लतीफ़ हुसैन 'नटवर', श्री लक्ष्मी नारायण सिंह, श्री लक्ष्मी नारायण गुप्त आदि हिन्दी-सेवियों और प्रबुद्ध नागरिकों की सभा में, की गयी।

सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन सुप्रसिद्ध साहित्यकार और 'हास्य-रसावतार' के रूप में समादृत पं जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी के सभापतित्व में ८-९ नवम्बर १९१९ को, सोनपुर मेले में, उसके मुख्यमंच पर आयोजित हुई, जिसमें उपरोक्त महानुभावों के अतिरिक्त प्रांत-भर के चर्चित साहित्यकारों, मनीषी विद्वानों और हिन्दी-प्रेमियों की उपस्थिति हुई।

जिसमें देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद, बाबू अनुग्रह नारायण सिंह, डा काशी प्रसाद जायसवाल, आचार्य बदरी प्रसाद वर्मा, पाण्डेय जगन्नाथ प्रसाद, श्री रामदहिन मिश्र, रायबहादुर द्वारकानाथ, श्री जगत नारायण लाल, पं प्रजापति मिश्र, राय बहादुर रामरणविजय सिंह, प्रो जीवन कृष्ण सरकार, श्री रामानन्द सिंह, पं रामचंद्र द्विवेदी, श्री गया प्रसाद वकील, महंथ दर्शन दास, पं जीवानंद शर्मा आदि अनेक मनीषी प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए।

अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष थे मुज़फ़्फ़रपुर नगरपालिका के अध्यक्ष और सुख्यात समाजसेवी श्री वैद्यनाथ प्रसाद सिंह।

१९३६ पटना में मुख्यालय का स्थानांतरण

वर्ष १९३६ में सम्मेलन के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री पं छविनाथ पाण्डेय के आग्रह पर, सम्मेलन का मुख्यालय बिहार की राजधानी पटना में स्थानांतरित हुआ।

पं छविनाथ पाण्डेय के उद्यम से बिहार सरकार से, पटना के कदमकुआँ में भूमि प्राप्त हुई, जिसमें सम्मेलन का वर्तमान भवन है।

सम्मेलन भवन के निर्माण में बनैलीराज के राजाबहादुर कीर्त्यानन्द सिंह के द्वारा प्रदत्त दस हज़ार रूपए का विशेष योगदान था। इसीलिए सम्मेलन भवन को उनकी स्मृति को समर्पित किया गया है। राज्यसरकार की ओर से प्राप्त २७०० रूपए के प्रथम किश्त एवं साहित्यकारों द्वारा संग्रहित पाँच हज़ार की राशि भी इसमें सम्मिलित है। निर्माण-कार्य में साहित्यकारों ने श्रम-दान भी किए।

१०७
वर्षों की गौरवशाली साहित्यिक विरासत

सम्मेलन के गौरवशाली १०७ वर्ष के इतिहास में, देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर', आचार्य शिवपूजन सहाय, राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, पं सकल नारायण शर्मा, राजा बहादुर कीर्त्यानंद सिंह, पं चंद्रशेखरधर मिश्र, महान इतिहासकार डा काशी प्रसाद जायसवाल, महापण्डित राहुल सांकृत्यायन श्री शिवनन्दन सहाय, संन्यासी भवानी दयाल, श्री ब्रजनंदन सहाय 'व्रजवल्लभ', पं छविनाथ पाण्डेय,पं जनार्दन प्रसाद झा 'द्विज', श्री यशोदानंदन अखौरी, डा लक्ष्मी नारायण सुधांशु, श्री रामवृक्ष बेनीपुरी, महाकवि पं मोहन लाल महतो वियोगी, महकवि पं राम दयाल पाण्डेय, श्री रामधारी प्रसाद 'विशारद', श्री साँवलिया बिहारी लाल वर्मा, पं जगन्नाथ प्रसाद मिश्र आदि मनीषियों ने सम्मेलन के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया।

सम्मेलन से जुड़े प्रमुख मनीषी

डा राजेंद्र प्रसाद रामधारी सिंह 'दिनकर' आचार्य शिवपूजन सहाय राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह डा काशी प्रसाद जायसवाल राहुल सांकृत्यायन रामवृक्ष बेनीपुरी पं छविनाथ पाण्डेय डा लक्ष्मी नारायण सुधांशु पं जनार्दन प्रसाद झा 'द्विज' महाकवि पं मोहन लाल महतो वियोगी पं जगन्नाथ प्रसाद मिश्र

हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए योगदान

सम्मेलन ने हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार और उन्नयन में बिहार के साहित्य के नेतृत्वकर्ता और प्रवक्ता की भाँति अद्वितीय, अप्रतिम और ऐतिहासिक कार्य किए हैं, जिस निमित्त बिहार के पूर्वज साहित्यकारों और मनीषियों ने इसकी स्थापना की है।

सम्मेलन द्वारा प्रकाशित अनेक पुस्तकों में से एक, १००८ पृष्ठोंवाली पुस्तक 'बिहार की साहित्यिक प्रगति' के अवलोकन से यह विदित होगा कि हिन्दी के लिए सम्मेलन और इसके अधिकारियों ने क्या-क्या बलिदान किए और कैसा-कैसा महान उद्यम किया।

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